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غم اندر سينهام امشب فزون از آب دريا شد |
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سيه دارد فلك بر تن چو گاه سوگ زهرا شد | |
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به مشرق سر برهنه چهره خورشيد شد ظاهر |
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رخ مهتاب شد نيلي از اين ظلمي كه بر پا شد | |
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نظر بر آسمان كردم و ديدم ابر بغضآلود |
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ز اشك چشم او سيراب كوه ودشت وصحرا شد | |
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نميدانم مدينه از چه رو اينسان شده خاموش |
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گلويش ميفشارد غصه مردي كه تنها شد | |
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به شب هنگام آن گوهر به زير خاك شد پنهان |
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زمين شد آسماني،زان گرانگنجي كه آنجا شد | |
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به شهر خفته پاشيدند گوني خاك غفلت را |
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نفهميدند آن شب را، به هنگامي كه فردا شد | |
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سَموم جاهليت ياس را در باغ پرپر كرد |
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شقايق داغ گشت ولاله از خون جام صهبا شد | |
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چو خورشيد جهانآرا به گوش ماه نجوا كرد |
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رخ مهتاب شد رخشان و چون خورشيدزيبا شد | |
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سحرگاهان ز فرقت تكيه بر ديوار زد شمشاد |
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ز آب ديده آن رخسار زيبا همچو دريا شد | |
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ز داغ ياس در گلشن برآمد ناله بلبل |
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به لرزه غنچه گل برفراز شاخ رعنا شد | |
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به عرش ايزدي بر تختي از نور آن گل رعنا |
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به سوي باغ رضوان رفته و مهمان بابا شد
التماس دعا - غلامرضا هاشمی | |


