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به شهر مكه امشب درّ پنهاني پديد آمد |
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كه كل عالم خلقت ز رويش، روسفيد آمد | |
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جهان پرنور شد از جلوه آن گوهر تابان |
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به يمن مقدمش بر آرزومندان نويد آمد | |
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رخ مهتاب شد شرمنده از آن مهر عالمتاب |
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چو يك پرتو ز انوارش در اين عالم پديد آمد | |
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زمين و آسمان درحلقه چشمش مسخّر شد |
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به كام دوستداران شكر و نقل و نبيد آمد | |
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به بستان ديده نرگس زشوق دوست شهلا شد |
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به رقص اندر به باد صبحدم زلفان بيدآمد | |
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به صوت دلنشين از عرش ايزد نغمه تبريك |
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سحرگاهان چو پشت شب ز نور او خميد آمد | |
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صداي چهچه بلبل به كوهستان و در صحرا |
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چو باد صبحگاهان پرده گل را دريد آمد | |
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جهان پرنور از رخساره روي محمد(ص) شد |
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نواي ربنا از قدرت رب حميد آمد | |
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دهان هاشمي از گفتن نامش شده شيرين |
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توگويي موسم عيش و نشاط روز عيد آمد | |



